ईद-उल-मिलादुन्नबी: मोहब्बत-ए-रसूल का तक़ाज़ा-अमल और किरदार है


 

यौम-ए-विलादत और यौम-ए-विसाल के मौक़े पर मुहासिबा-ए-नफ़्स का वक़्त।

मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ: नारों से नहीं, किरदार और अमल से होगी साबित।

रिपोर्ट-मौ.गुलबहार गौरी

रूड़की-26 अगस्त 2026 आज हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की विलादत और विसाल से जुड़ा वह मुक़द्दस दिन है, जिसे दुनिया भर के मुसलमान अपनी-अपनी रवायत और अक़ीदत के मुताबिक़ याद करते हैं। बहुत से मुसलमान इसे ईद-उल-मिलादुन्नबी के तौर पर ख़ुशी, के तौर पर मनाते है जबकि कुछ लोग दरूदो-सलाम, ज़िक्र और इबादत के साथ मनाते हैं, और उसका सवाब नबी-ए-करीम ﷺ को पहुँचाने की कोशिश करते हैं। यह दिन जहां मोहब्बत और अक़ीदत का पैग़ाम देता है, वहीं नबी-ए-पाक ﷺ के विसाल की याद में ग़म और उदासी का एहसास भी पैदा करता है।

लेकिन सवाल यह है कि मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का असल तक़ाज़ा क्या है?

हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने अपनी पूरी ज़िंदगी कुरआन के बताए रास्ते पर चलकर इंसानियत को अमन, रहम, भाईचारे, इंसाफ़ और नेक किरदार का पैग़ाम दिया। आपने अपनी उम्मत को नमाज़ की पाबंदी, पड़ोसियों के हक़ अदा करने, ज़रूरतमंदों की मदद करने और हर इंसान के साथ अच्छे अख़लाक़ से पेश आने की ताकीद फ़रमाई।

नबी-ए-करीम ﷺ की तालीमात में पड़ोसी के हक़ को विशेष अहमियत हासिल है। पड़ोसी चाहे मुसलमान हो या ग़ैर-मुस्लिम, उसके साथ भलाई, हमदर्दी और इंसानियत का व्यवहार करना इस्लामी अख़लाक़ का हिस्सा है। ऐसे में आज हर मुसलमान को अपने ज़मीर से सवाल करना चाहिए कि क्या हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नबी ﷺ की इन सुन्नतों पर उसी तरह अमल कर रहे हैं, जिस तरह हम दावा करते हैं कि हमें अपने नबी से बेपनाह मोहब्बत है?

मोहब्बत सिर्फ़ नारों, जुलूसों और रोशनी से साबित नहीं होती, बल्कि मोहब्बत का सबसे बड़ा सबूत इंसान का किरदार और उसका अमल होता है।

अगर कोई शख़्स नबी ﷺ की मोहब्बत में जुलूस में शामिल हो, लेकिन उसी दौरान नमाज़ को छोड़ दे, तो उसे अपने अमल पर ग़ौर करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति नबी ﷺ की याद में रातभर मोटरसाइकिलों पर बाज़ारों में शोर-शराबा और हुड़दंग करे, लोगों को तकलीफ़ पहुँचाए या रास्तों में परेशानी पैदा करे, तो यह सवाल ज़रूर उठेगा कि क्या ऐसा आचरण उस रहमत वाले नबी ﷺ की तालीमात के मुताबिक़ है?

इसी तरह ढोल-नगाड़े और दूसरे तौर-तरीकों के बारे में भी उलमा-ए-किराम के बीच अलग-अलग राय पाई जाती है। इसलिए किसी भी अमल को मोहब्बत का नाम देने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि वह शरीअत, अदब, नमाज़ और दूसरों के हक़ के खिलाफ़ तो नहीं।

12 वफ़ात के मौके पर हमें सिर्फ़ जुलूस में शामिल होने के बजाय अपनी ज़िंदगी का भी मुहासबा करना चाहिए। क्या हम पांचों वक्त की नमाज़ पढ़ते हैं? क्या हम अपने पड़ोसी के दुख-दर्द में उसके साथ खड़े होते हैं? क्या हम गरीब और मजबूर इंसान की मदद करते हैं? क्या हमारे कारोबार में ईमानदारी है? क्या हमारी ज़बान से किसी को तकलीफ़ नहीं पहुँचती? क्या हमारे घर, मोहल्ले और समाज में हमारे किरदार से अमन और मोहब्बत फैलती है?

अगर इन सवालों का जवाब मुस्बत है, तो यही नबी-ए-करीम ﷺ की सच्ची पैरवी और इताअत है।

ईद-उल-मिलादुन्नबी का पैग़ाम सिर्फ़ एक दिन की खुशी तक महदूद नहीं होना चाहिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि नबी ﷺ से मोहब्बत का असल तक़ाज़ा उनकी सीरत को अपनी ज़िंदगी में उतारना है।

नबी-ए-करीम ﷺ की याद में दरूद पढ़ें, सलाम पेश करें, इबादत करें, ज़रूरतमंदों की मदद करें, पड़ोसियों के हक़ अदा करें, नमाज़ की पाबंदी करें और अपने किरदार को सुन्नत के मुताबिक़ बेहतर बनाने की कोशिश करें।

यही मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ की सबसे खूबसूरत पहचान और हमारी ज़िंदगी के लिए सबसे बड़ा पैग़ाम हो सकता है।


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