हार्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव: अमेरिकी कूटनीति नाकाम या कोई गहरी साज़िश।
ईरान की दबाव की रणनीति, टकराव से बचते हुए मक़सद हासिल करने की कोशिश ।
“ रिपोर्ट-मौ. गुलबहार गौरी ”
नई दिल्ली -24अप्रैल 2026 – खाड़ी इलाक़ा इस वक़्त बेहद नाज़ुक सूरत-ए-हाल से गुज़र रहा है, जहाँ हार्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर पैदा हुआ तनाव आलमी सियासत का अहम तरीन मुद्दा बन चुका है। ईरान की जानिब से इस अहम समुंद्री रास्ते को बंद करने की कोशिश को कई माहिरीन एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल करार दे रहे हैं। दरअसल, दुनिया की बड़ी तादाद में तेल और गैस की रसद इसी रास्ते से होकर गुज़रती है, और इसके बंद होने का मतलब है कि पूरी दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट से दो-चार हो सकती है।
माहिरीन का कहना है कि ईरान का मक़सद महज़ रास्ता बंद करना नहीं, बल्कि आलमी बिरादरी पर दबाव डालना है ताकि उस पर लगी इक़्तिसादी पाबंदियां हटाई जा सकें। ईरान यह अच्छी तरह जानता है कि अगर तेल और गैस की सप्लाई मुतास्सिर होती है, तो बड़ी ताक़तें इस मसले को हल कराने के लिए मैदान में उतरेंगी। यही वजह है कि उसने हालात को इस हद तक ले जाने की कोशिश की, जहाँ पूरी दुनिया उसकी तरफ़ मुतवज्जेह हो जाए।
इस तनाज़ुर में एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि हार्मुज़ के बंद होने के बावजूद ईरान ने अपने दोस्त मुल्कों—जिनमें भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे अहम देश शामिल हैं—के जहाज़ों को गुजरने की इजाज़त दी। साथ ही ईरान, सऊदी अरब, क़तर, ओमान, बहरीन और कुवैत जैसे खाड़ी देशों का तेल और गैस भी इन मुल्कों तक पहुँचता रहा। यह कदम ईरान की एक बड़ी मजबूरी भी था, क्योंकि अगर वह अपने करीबी देशों को भी रोक देता, तो उसे संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों से मिलने वाली संभावित मदद से महरूम होना पड़ सकता था। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि ईरान मुकम्मल टकराव नहीं चाहता, बल्कि दबाव की सियासत के ज़रिए अपने मक़ासिद हासिल करना चाहता है।
दूसरी जानिब, अमेरिका की भूमिका पर भी अब संगीन सवालात उठने लगे हैं। कुछ तजज़िया निगारों का मानना है कि अमेरिका ने हालात को काबू में करने के बजाय ऐसी रणनीति अपनाई, जिससे ईरान को ग़ैर-मुस्तक़ीम तौर पर फ़ायदा पहुंचा। खबरों के मुताबिक, अमेरिका ने जलडमरूमध्य से तक़रीबन 300 किलोमीटर आगे बैरिकेडिंग कर दी, जिससे सऊदी अरब समेत खाड़ी देशों के जहाज़ों की आवाजाही और ज़्यादा मुतास्सिर हो गई। नाक़िदीन का कहना है कि जो काम ईरान पूरी तरह अंजाम नहीं दे पाया, वह अमेरिका की इस कार्रवाई से खुद-ब-खुद मुकम्मल हो गया, और पूरी तरह से जलडमरूमध्य बंद होना ईरान के हक़ में जाता दिखाई दे रहा है।
इस पूरे मुआमले को अमेरिकी कूटनीति की नाकामी के तौर पर भी देखा जा रहा है। एक तरफ़ अमेरिका तनाव कम करने की बातें करता है, तो दूसरी तरफ़ उसके क़दम हालात को और उलझा देते हैं। इससे यह सवाल पैदा होता है कि क्या यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर वाकई में पॉलिसी बनाने में कोई बड़ी चूक हुई है।
माहिरीन-ए-ऊर्जा का कहना है कि अगर यही सूरत-ए-हाल बरक़रार रही, तो दुनिया भर में ऊर्जा का संकट तेज़ी से बढ़ सकता है। तेल की कीमतों में इज़ाफ़ा, गैस की कमी और आलमी मआशियात पर इसके गहरे असरात साफ़ दिखाई देंगे। ख़ासतौर पर वे मुल्क जो आयातित ऊर्जा पर इनहिसार करते हैं, उनके लिए हालात और भी पेचीदा हो सकते हैं।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि हार्मुज़ जलडमरूमध्य का यह संकट अब सिर्फ़ एक इलाक़ाई मसला नहीं, बल्कि एक आलमी चुनौती बन चुका है, जिसके असरात आने वाले दिनों में और भी वाज़ेह हो सकते हैं।