ताक़त की सियासत बनाम इंसाफ़ का उसूल: दुनिया किस राह पर?
खाड़ी देशों की भूमिका पर उठते सवाल, सियासी गलियारों में हलचल
बिना सबूत हमले का सवाल: क्या अंतरराष्ट्रीय कानून को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है ।
रिपोर्ट-मौ. गुलबहार गौरी
3 मार्च 2026 – दुनिया की सियासत एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ इल्ज़ामात, अंदेशे और ताक़त का खेल इंसानियत के बड़े सवालों को जन्म दे रहा है। किसी भी मुल्क पर सिर्फ इस बुनियाद पर हमला कर देना कि वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है—बिना किसी ठोस और सार्वजनिक सबूत के—क्या यह अंतरराष्ट्रीय कानून और इंसाफ़ के उसूलों के मुताबिक़ है? यही सवाल आज वैश्विक बहस का मरकज़ बन गया है।
हालिया बयान में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने साफ़ तौर पर कहा कि ईरान के परमाणु बम बनाने का कोई पुख़्ता सबूत सामने नहीं आया है। उनका कहना था कि ईरान को शांतिपूर्ण मक़ासिद के लिए यूरेनियम संवर्धन के उसके वैध अधिकार से महरूम करना उल्टा असर डाल सकता है। लावरोव ने आगाह किया कि अगर इस तरह की जंग थोपी गई तो पड़ोसी मुल्कों में भी परमाणु महत्वाकांक्षाएं जन्म ले सकती हैं, जिससे पूरा इलाक़ा अस्थिरता की आग में झुलस सकता है।
दुनिया भर में यह आवाज़ उठ रही है कि संभावित हमलों के पीछे ताक़तवर देशों—ख़ासतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल का हाथ है। लेकिन कुछ हल्कों में यह भी कहा जा रहा है कि खाड़ी के कुछ मुस्लिम मुल्क पर्दे के पीछे से इन कार्रवाइयों को सह दे रहे हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक तस्दीक़ नहीं हुई है, लेकिन सियासी गलियारों में इन चर्चाओं ने हलचल पैदा कर दी है।
मामला सिर्फ किसी एक मुल्क तक महदूद नहीं है। बीते सालों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जिनमें टॉप लीडरशिप को निशाना बनाया गया। लोग मिसाल के तौर पर मुअम्मर गद्दाफी और सद्दाम हुसैन का ज़िक्र करते हैं, जिनकी हुकूमतों का अंत बाहरी दख़लअंदाज़ी और सैन्य कार्रवाइयों के बाद हुआ। फ़लस्तीन के ग़ज़ा इलाक़े में जारी हिंसा भी इंसानी ज़िंदगी की क़ीमत पर सियासी टकराव की मिसाल बन चुकी है। अब कुछ लोग अली ख़ामेनेई को लेकर भी तरह-तरह की अटकलें लगा रहे हैं, जिससे माहौल और ज़्यादा संगीन होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून का उसूल कहता है कि किसी भी मुल्क की संप्रभुता (सॉवरेनिटी) का एहतराम किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक़, आत्मरक्षा को छोड़कर किसी देश पर हमला करना गैर-क़ानूनी माना जाता है। ऐसे में अगर किसी देश पर बिना निर्णायक सबूत के हमला होता है, तो यह नज़ीर (precedent) दुनिया के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है। कल को कोई भी ताक़तवर राष्ट्र महज़ शक़ के आधार पर कार्रवाई का जस्टिफ़िकेशन पेश कर सकता है।
सियासी तजज़िया निगारों का कहना है कि अगर “प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक” यानी संभावित ख़तरे को रोकने के नाम पर हमलों का चलन बढ़ता है, तो दुनिया में अविश्वास की दीवारें और ऊँची होंगी। छोटे और मध्यम ताक़त वाले मुल्क अपनी हिफ़ाज़त के लिए परमाणु हथियारों की तरफ़ तेज़ी से रुख़ कर सकते हैं। इस तरह जो जंग किसी एक मुल्क को रोकने के लिए छेड़ी जाएगी, वही कई और मुल्कों को परमाणु दौड़ में धकेल सकती है।
खाड़ी देशों को लेकर उठ रही आवाज़ें भी कम अहम नहीं हैं। सोशल मीडिया और कुछ सियासी मंचों पर यह मांग उठ रही है कि अगर वाक़ई पर्दे के पीछे कोई साज़िश है, तो मुस्लिम दुनिया को ऐसे मुल्कों के ख़िलाफ़ खुलकर आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। हालांकि अभी तक इन इल्ज़ामात की तस्दीक़ नहीं हुई है, लेकिन यह बहस मुस्लिम उम्मा की सियासी एकजुटता और आंतरिक मतभेदों को भी उजागर करती है।
माहिर-ए-कानून का कहना है कि ऐसे नाज़ुक मसाइल का हल जंग नहीं, बल्कि कूटनीतिक गुफ़्तगू, अंतरराष्ट्रीय निगरानी और पारदर्शिता से निकल सकता है। परमाणु कार्यक्रमों की जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की मौजूदगी और संवाद का रास्ता ही दुनिया को महफ़ूज़ रख सकता है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि जज़्बात से ऊपर उठकर हक़ीक़त, सबूत और अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में फैसले लिए जाएँ। वरना टॉप लीडरशिप को निशाना बनाने और संप्रभु देशों पर हमले का यह चलन अगर आम हो गया, तो आने वाले वक़्त में पूरी दुनिया अस्थिरता, अविश्वास और ख़ौफ़ के साये में जीने को मजबूर हो सकती है।
आलमी बिरादरी के सामने इम्तिहान यही है—क्या वह ताक़त की सियासत को तरजीह देगी या इंसाफ़ और अमन के उसूलों को? यही फैसला आने वाले दौर की दिशा तय करेगा।