113 विधायकों का समर्थन फिर भी इंतज़ार, तमिलनाडु विवाद ने छेड़ी संवैधानिक बहस


तमिलनाडु में 5 सीटें कम तो सख्ती क्यों, जब भाजपा कई राज्यों में बहुमत से दूर होकर भी बना चुकी सरकार ।

113 विधायकों का समर्थन फिर भी इंतज़ार, तमिलनाडु विवाद ने छेड़ी संवैधानिक बहस ।

रिपोर्ट-मौ.गुलबहार गौरी
नई दिल्ली-8 मई 2026- भारत की सियासत में राज्यपाल की भूमिका एक बार फिर बहस के केंद्र में है। तमिलनाडु में TVK पार्टी को लेकर पैदा हुआ ताज़ा राजनीतिक विवाद इस सवाल को और गहरा कर रहा है कि आखिर सरकार बनाने के लिए बहुमत का पैमाना अलग-अलग राज्यों में अलग क्यों दिखाई देता है। जब देश के कई राज्यों में भाजपा को पूर्ण बहुमत से काफी दूर होने के बावजूद सरकार बनाने का मौका दिया गया, तब अब मात्र पाँच विधायकों की कमी होने पर पूरे 118 विधायकों के समर्थन का दावा मांगना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

तमिलनाडु की राजनीति में इस समय चर्चा इस बात को लेकर है कि TVK पार्टी को कांग्रेस समेत कुल 113 विधायकों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा है, जबकि बहुमत का आंकड़ा 118 है। यानी सरकार बनाने के लिए सिर्फ़ 5 विधायकों की कमी बताई जा रही है। इसके बावजूद राज्यपाल द्वारा पूरे बहुमत का स्पष्ट समर्थन मांगना विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या संवैधानिक परंपराएं राज्यों और दलों के हिसाब से बदल जाती हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री शपथ लेने के बाद विधानसभा में बहुमत साबित करता है। 1994 में S. R. Bommai vs Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि किसी सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि सदन के फ़्लोर टेस्ट से होना चाहिए, और राज्यपाल को बहुमत साबित करने का अवसर देना आवश्यक है।

पिछले दस वर्षों का राजनीतिक इतिहास देखें तो कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जब भाजपा ने पूर्ण बहुमत से काफी दूर होने के बावजूद सरकार बनाई और राज्यपालों ने उन्हें शपथ भी दिलाई। सबसे चर्चित मामला वर्ष 2018 में कर्नाटक का था, जहाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता B. S. Yediyurappa को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, जबकि भाजपा के पास केवल 104 विधायक थे और बहुमत के लिए 112 सीटों की जरूरत थी। यानी भाजपा बहुमत से 8 सीटें दूर थी।

इसी तरह वर्ष 2017 में गोवा में भाजपा के पास सिर्फ़ 13 सीटें थीं, जबकि बहुमत का आंकड़ा 21 था। इसके बावजूद Manohar Parrikar को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। भाजपा यहाँ भी बहुमत से 8 सीटें कम थी, लेकिन सहयोगी दलों के समर्थन के दावे के आधार पर सरकार बनाई गई।

मणिपुर में भी 2017 में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन भाजपा ने सहयोगियों के समर्थन का दावा पेश किया और N. Biren Singh को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। उस समय भाजपा के पास 21 विधायक थे, जबकि बहुमत के लिए 31 सीटों की जरूरत थी। यानी भाजपा 10 सीटें कम होने के बावजूद सत्ता में आ गई।

मेघालय में वर्ष 2018 में भाजपा समर्थित गठबंधन ने सरकार बनाई, जबकि Conrad Sangma की पार्टी NPP के पास केवल 19 विधायक थे और बहुमत का आंकड़ा 31 था। यहाँ भी बहुमत से 12 सीटें कम होने के बावजूद सरकार बनाने का अवसर दिया गया।

महाराष्ट्र में वर्ष 2019 का घटनाक्रम तो देश की राजनीति के सबसे विवादित अध्यायों में गिना जाता है। भाजपा नेता Devendra Fadnavis ने अचानक मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जबकि भाजपा अकेले 105 सीटों पर थी और बहुमत के लिए 145 सीटों की जरूरत थी। हालांकि भाजपा ने समर्थन का दावा किया था, लेकिन राजनीतिक विवाद इतना बढ़ा कि आखिरकार सरकार कुछ ही दिनों में गिर गई।

इसी प्रकार मध्य प्रदेश में वर्ष 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के बाद भाजपा नेता Shivraj Singh Chouhan ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उस समय भाजपा के पास 107 विधायक थे और बहुमत के लिए 116 का आंकड़ा चाहिए था। यानी भाजपा 9 सीटें कम थी, लेकिन बाद में समर्थन जुटाकर बहुमत साबित किया गया।

इन उदाहरणों के आधार पर अब राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि यदि अतीत में कई राज्यों में बहुमत से काफी दूर रहने के बावजूद सरकार बनाने का अवसर दिया गया, तो तमिलनाडु में मात्र 5 विधायकों की कमी होने पर इतनी सख्ती क्यों दिखाई जा रही है? विपक्ष का आरोप है कि संवैधानिक पदों की निष्पक्षता पर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि अलग-अलग दलों के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए जाते दिखाई देते हैं।

हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल के पास यह अधिकार होता है कि वह किसी भी दल या गठबंधन से स्पष्ट समर्थन पत्र मांग सकते हैं, ताकि विधानसभा में स्थिर सरकार सुनिश्चित की जा सके। लेकिन भारतीय राजनीति में यह बहस लगातार जारी है कि क्या यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप होती है या फिर राजनीतिक परिस्थितियों और सत्ता समीकरणों से प्रभावित दिखाई देती है।

तमिलनाडु का मौजूदा विवाद भी अब सिर्फ़ सरकार गठन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह संघीय ढांचे, राज्यपाल की भूमिका और लोकतांत्रिक परंपराओं पर एक बड़ी राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है।


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