सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: आसाराम आश्रम की ज़मीन पर गुजरात सरकार की कार्रवाई पर रोक।
गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, नोटिस पर उठाए सवाल।
रिपोर्ट- मौ. गुलबहार गौरी
नई दिल्ली/अहमदाबाद। 29 अप्रैल 26 – सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद के मोटेरा क्षेत्र में स्थित विवादित आसाराम बापू से जुड़े आश्रम की लगभग 45,000 वर्ग मीटर जमीन को लेकर गुजरात सरकार की प्रस्तावित कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने 5 मई 2026 तक यथास्थिति (status quo) बनाए रखने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि इस अवधि में कोई भी दंडात्मक या जबरन कब्जे की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
यह आदेश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिया। पीठ ने अपने अंतरिम फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie) अधिकारियों द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस में पर्याप्त विवरण का अभाव दिखाई देता है, जिससे यह मामला गंभीर कानूनी जांच का विषय बनता है। अदालत ने इस पर राज्य सरकार से विस्तृत जवाब भी तलब किया है।
मामला अहमदाबाद के मोटेरा इलाके में स्थित उस आश्रम से जुड़ा है, जो नरेंद्र मोदी स्टेडियम के पास स्थित है। गुजरात सरकार का कहना है कि संबंधित ट्रस्ट ने जमीन के पट्टे (लीज) की शर्तों का उल्लंघन किया है और परिसर में अवैध अतिक्रमण भी किया गया है। सरकार के अनुसार, यह जमीन सार्वजनिक उपयोग के लिए दी गई थी, लेकिन इसका उपयोग निर्धारित शर्तों के विपरीत किया गया, जिसके चलते इसे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की गई।
इससे पहले गुजरात हाई कोर्ट ने 17 अप्रैल 2026 को अपने आदेश में राज्य सरकार को जमीन वापस लेने की अनुमति दे दी थी। हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ आश्रम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार की कार्रवाई जल्दबाज़ी में की जा रही है और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि कारण बताओ नोटिस में किन आधारों पर कार्रवाई प्रस्तावित की गई है। अदालत ने कहा कि नोटिस में स्पष्ट तथ्यों और आरोपों का अभाव दिखता है, जिससे प्रभावित पक्ष को अपना बचाव प्रस्तुत करने में कठिनाई हो सकती है। इसी आधार पर कोर्ट ने फिलहाल राज्य सरकार की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।
आश्रम से जुड़े पक्षकारों ने अदालत में दलील दी कि यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी धार्मिक संस्था की संपत्ति पर कार्रवाई करना संविधान के प्रावधानों के विपरीत हो सकता है। वहीं, राज्य सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि वह कानून के तहत ही कदम उठा रही है और यदि किसी प्रकार का उल्लंघन हुआ है, तो कार्रवाई करना उसका अधिकार और दायित्व दोनों है।
इस मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि धार्मिक ट्रस्टों और संस्थाओं की संपत्तियों पर राज्य का नियंत्रण किस हद तक होना चाहिए और क्या सरकारी एजेंसियां उचित प्रक्रिया का पालन कर रही हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश यह संकेत देता है कि अदालत किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया (due process) को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।
मीडिया कवरेज को लेकर भी विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ वर्गों का आरोप है कि इस महत्वपूर्ण मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उतनी प्रमुखता नहीं दी जा रही, जितनी दी जानी चाहिए। हालांकि कई मीडिया संस्थान इसे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहते हैं कि जैसे-जैसे मामले में ठोस प्रगति होगी, कवरेज भी बढ़ेगी।
गौरतलब है कि आसाराम बापू पहले से ही कई गंभीर आपराधिक मामलों में सजा काट रहे हैं, जिसके चलते उनके आश्रमों और ट्रस्ट से जुड़ी संपत्तियां अक्सर विवादों में रहती हैं। ऐसे में यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और कानूनी आयामों को भी छूता है।
अब इस मामले में अगली महत्वपूर्ण तारीख 5 मई 2026 है, जब सुप्रीम कोर्ट में दोबारा सुनवाई होगी। तब तक के लिए अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। इस बीच सभी पक्षों को अपने-अपने तर्क और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा, जिसके आधार पर अदालत आगे का निर्णय लेगी।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने स्थिति को स्थिर बनाए रखा है और यह सुनिश्चित किया है कि बिना पूरी सुनवाई के किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई न की जाए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगामी सुनवाई में अदालत इस मामले को किस दिशा में आगे बढ़ाती है और क्या राज्य सरकार को अपनी कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करने में सफलता मिलती है या नहीं।