सैनी आश्रम ज्वालापुर पर साज़िश नाकाम, फर्जी प्रबंध समिति का पंजीकरण निरस्त
रिपोर्ट-मौ. गुलबहार गौरी
हरिद्वार, 17 जनवरी 26
सैनी समाज की ऐतिहासिक और प्राचीन धरोहर सैनी आश्रम, ज्वालापुर को कब्ज़ाने और उसकी संपत्ति को खुर्दबुर्द करने की कथित साज़िश पर बड़ा झटका लगा है। सैनी आश्रम बचाओ संघर्ष समिति ने दावा किया है कि जाली दस्तावेज़ों और ग़लत तथ्यों के आधार पर पंजीकृत कराई गई प्रबंध समिति सैनी आश्रम, ज्वालापुर का पंजीकरण रजिस्ट्रार, सोसाइटी फर्म एंड चिट्स उत्तराखंड, देहरादून द्वारा निरस्त कर दिया गया है।
प्रेस क्लब हरिद्वार में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए संघर्ष समिति के संरक्षक मनोज सैनी ने कहा कि कुछ लोगों ने निजी स्वार्थ और गलत नीयत के चलते सैनी आश्रम जैसी समाज की अमानत पर गिद्ध दृष्टि डाली। उन्होंने आरोप लगाया कि फर्जी और कूटरचित दस्तावेज़ों के सहारे एक संस्था का पंजीकरण कराया गया, जिसका उद्देश्य समाज सेवा नहीं बल्कि आश्रम की संपत्ति पर कब्ज़ा करना था।
मनोज सैनी ने बताया कि रजिस्ट्रार कार्यालय में दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद 13 जनवरी को उक्त संस्था को फर्जी मानते हुए उसका पंजीकरण निरस्त कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यह संस्था न तो अपने आय-व्यय का कोई लेखा-जोखा प्रस्तुत कर सकी और न ही नियमों के अनुसार ऑडिट कराया गया। धनबल और राजनीतिक दबाव के सहारे बनाई गई इस संस्था की पोल आखिरकार खुल गई और सत्य की जीत हुई।
उन्होंने कहा कि सैनी आश्रम केवल एक भवन नहीं बल्कि सैनी समाज की आस्था, इतिहास और सामाजिक एकता का प्रतीक है। समाज की इस प्राचीन धरोहर को किसी भी कीमत पर खुर्दबुर्द नहीं होने दिया जाएगा। जब-जब किसी ने आश्रम पर गलत नज़र डालने की कोशिश की, समाज ने एकजुट होकर उसका जवाब दिया है और आगे भी देता रहेगा।
पत्रकार वार्ता में मौजूद मंत्री डॉ. संजीव सैनी, समय सिंह सैनी और तेजप्रकाश सैनी ने भी संघर्ष समिति के दावे का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सैनी आश्रम समाज सेवा का एक बड़ा केंद्र रहा है, जहां वर्षों से सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियां संचालित होती रही हैं। कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा आश्रम की संपत्ति पर कब्ज़ा करने की कोशिश की गई और कई तरह की अनियमितताएं की गईं, लेकिन आखिरकार सच सामने आ गया।
नेताओं ने कहा कि अब समाज के लोगों को साथ लेकर जल्द ही जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी से मुलाकात की जाएगी, ताकि आश्रम की व्यवस्थाएं विधिवत रूप से समाज के हाथों में रहें और भविष्य में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे।
अंत में मनोज सैनी ने कहा कि यह लड़ाई केवल एक संस्था के खिलाफ नहीं थी, बल्कि समाज की अस्मिता और विरासत को बचाने की जंग थी। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि झूठ, फरेब और साज़िश कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः जीत सत्य की ही होती है।