जलियांवाला बाग के खौफनाक हादसे के बीच एसपी खान अहमद जान ने अंग्रेजी हुकूमत के हुक्म को ठुकराया।
निहत्थों पर गोली चलाने से किया इनकार, ओहदा छोड़ा लेकिन ज़मीर का सौदा नहीं किया।
रिपोर्ट- मौ.गुलबहार गौरी 🖍️ 15 अगस्त 2026 — आज़ादी के दिन पर विशेष।
15 अगस्त का दिन हमें सिर्फ़ आज़ादी की खुशी नहीं देता, बल्कि उन तमाम शहीदों और गुमनाम मुजाहिदीन की याद भी दिलाता है, जिन्होंने अपने आराम, ओहदे और जान तक को मुल्क की आज़ादी पर कुर्बान कर दिया। खान साहिब अहमद जान की दास्तान भी इसी गौरवशाली विरासत का हिस्सा है।
भारत की आज़ादी की जद्दोजहद में जलियांवाला बाग का हादसा तारीख़ का वह दर्दनाक बाब है, जिसे हिंदुस्तान कभी फरामोश नहीं कर सकता। 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर के हुक्म पर निहत्थे हिंदुस्तानियों पर बरसाई गई गोलियों ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया था। इस खौफनाक वाकये में शहीद होने वाले बेगुनाहों की कुर्बानियां तो तारीख़ में दर्ज हैं, लेकिन इसी दौर में अंग्रेजी हुकूमत के सामने अपने ज़मीर की आवाज़ पर सर न झुकाने वाले एसपी खान साहिब अहमद जान लुधियानवी की कुर्बानी आज भी गुमनामी के पर्दे में है।
लुधियाना की जामा मस्जिद में पत्रकारों से बातचीत के दौरान स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक रखने वाले पंजाब के शाही इमाम मौलाना उस्मान लुधियानवी ने बताया कि खान साहिब अहमद जान लुधियाना के वह होनहार सपूत थे, जिन्होंने लंदन से आला तालीम हासिल की थी। तत्कालीन वायसराय चेम्सफोर्ड से उनकी वाकफियत की वजह से उन्हें अमृतसर में पुलिस के आला ओहदे पर तैनात किया गया था।
शाही इमाम के मुताबिक, 12 अप्रैल 1919 की रात पंजाब के लेफ्टिनेंट-गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर और जनरल डायर ने अमृतसर में एसपी खान साहिब अहमद जान को बुलाया। उनसे कहा गया कि अगले दिन जलियांवाला बाग में जमा निहत्थे लोगों पर गोली चलानी होगी। खान साहिब ने इस अमानवीय हुक्म को मानने से साफ़ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि निहत्थों पर गोली चलाना बुज़दिली, दरिंदगी और इंसानियत के खिलाफ़ है।
बताया जाता है कि उनके इस इनकार पर जनरल डायर आग-बबूला हो गया और उन्हें ओहदे से हटाने की धमकी दी। खान साहिब ने अपनी पुलिस की पेटी उतारकर सामने रख दी और साफ़ अल्फ़ाज़ में कहा कि वह ऐसी दरिंदगी का हिस्सा नहीं बन सकते। इसके बाद उन्हें फौरन ओहदे से हटा दिया गया और वह उसी रात लुधियाना लौट आए।
बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने उनके खिलाफ़ कार्रवाई करते हुए उन्हें उनके मूल पद पुलिस इंस्पेक्टर पर डिमोट कर दिया। उनके साथ खड़े इंस्पेक्टर अशरफ खान को भी डिमोट कर सब-इंस्पेक्टर बना दिया गया। बताया जाता है कि दोनों ने दोबारा अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी स्वीकार नहीं की।
शाही इमाम के अनुसार खान अहमद जान 1944 तक जीवित रहे। ब्रिटिश हुकूमत की तरफ़ से उन्हें पेंशन और माफ़ी मांगकर दोबारा सरकारी ओहदा हासिल करने के संदेश भेजे जाते रहे, लेकिन उन्होंने न माफ़ी मांगी और न अपने उसूलों से समझौता किया। उन्होंने अपनी ज़िंदगी मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद करने वालों की हिमायत और खिदमत के लिए वक्फ़ कर दी।
उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी की जद्दोजहद सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में लड़ने वालों की दास्तान नहीं, बल्कि उन लोगों की भी कहानी है जिन्होंने ज़मीर की आवाज़ पर हुकूमत के हुक्म को ठुकरा दिया। ऐसे गुमनाम मुजाहिदीन का नाम हमारी तारीख़ और जलियांवाला बाग की यादगार में दर्ज होना चाहिए, ताकि आने वाली नस्लें जान सकें कि आज़ादी की यह नेमत हमें कितनी कुर्बानियों के बाद हासिल हुई।