डिप्टी कलेक्टर सहारनपुर नन्द किशोर की किताब ने उठाये डीएम के फ़ैसले पर सवाल


डिप्टी कलेक्टर मुंशी नन्द किशोर की 1877 की किताब से सहारनपुर मस्जिद मामले में नया मोड़, 83 बीघा ज़मीन का खुलासा।

1822 का किरायानामा, 1868 की चिट्ठी और 1911 का बिजली बिल सहारनपुर मस्जिद की मिल्कियत को साबित करने के अहम सबूत।

विशेष रिपोर्ट-मौ. गुलबहार गौरी

सहारनपुर। 14 सितंबर 2026- मस्जिद से जुड़े विवाद में उस वक्त एक नया मोड़ सामने आया, जब 1850-60 के दौर में सहारनपुर, मेरठ और बांदा में डिप्टी कलेक्टर के पद पर रहे मुंशी नन्द किशोर द्वारा लिखी गई एक किताब का हवाला सामने आया। बताया गया कि यह किताब वर्ष 1877 में प्रकाशित हुई थी। अब्दुररहमान आबिद ने इस किताब और पुराने सरकारी दस्तावेज़ों के आधार पर दावा किया है कि मौजूदा सरकारी कार्यालयों से जुड़ी ज़मीन के इतिहास को लेकर कई अहम सवाल खड़े होते हैं।

अब्दुररहमान आबिद के मुताबिक मुंशी नन्द किशोर साहब बन्दोबस्त के आला अधिकारी भी रहे थे। उनकी किताब में पठानपुरा, सहारनपुर के ज़मींदार अब्दुल वाहिद खान/याकूब खान की करीब 83 बीघा ज़मीन का ज़िक्र मिलता है। आबिद का कहना है कि आज इसी ज़मीन के हिस्से में जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी, एसडीएम, तहसीलदार, एलआईयू, एसएसपी और पुलिस लाइन समेत कई सरकारी कार्यालय मौजूद हैं।

बताया गया कि सहारनपुर में कलेक्ट्रेट वर्ष 1818 में वजूद में आया और अंग्रेज अधिकारी मिस्टर मोर यहां पहले कलेक्टर बने। इसके बाद वर्ष 1822 में अंग्रेज हुकूमत ने याकूब खान/अब्दुल वाहिद खान से ज़मीन किराये पर ली। इसके लिए सालाना किराया 21 रुपये 2 आने तय किया गया था। आबिद का दावा है कि अंग्रेजों के मुल्क छोड़ने के बाद तक भी इस ज़मीन का किराया अदा किया जाता रहा।

इसी सिलसिले में 30 जुलाई 1868 को सहारनपुर के तत्कालीन कलेक्टर ने मेरठ कमिश्नर को एक चिट्ठी लिखी, जिसका नम्बर 212 बताया गया है। आबिद के मुताबिक इस पत्र में कलेक्टर ने प्रस्ताव रखा था कि जिस ज़मीन का सरकार किराया अदा कर रही है, उसका भूमि अधिग्रहण कर लिया जाए और जमीन के मालिक को एकमुश्त मुआवज़ा दे दिया जाए। यह प्रस्ताव मेरठ कमिश्नर द्वारा बोर्ड के सामने रखा गया, लेकिन बोर्ड ने कलेक्टर की राय को मंज़ूर नहीं किया। बोर्ड का कहना था कि सरकार का जमीन मालिक से किराये का करारनामा है, इसलिए जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा।

अब्दुररहमान आबिद ने आगे कहा कि वर्ष 1960 में भारत सरकार ने डाकघर के लिए मस्जिद से जमीन किराये पर ली थी। उनके मुताबिक डाकघर द्वारा मस्जिद के मालिकों को किराया मस्जिद के शहीद किए जाने तक अदा किया जाता रहा। आबिद का तर्क है कि यदि भारत सरकार ने जमीन किराये पर ली और किराया अदा किया तो यह बात भी संपत्ति के मालिकाना हक़ से जुड़े सवाल को पुख़्ता बनाती है।

आबिद ने यह भी सवाल उठाया कि जिलाधिकारी सहारनपुर और सिटी मजिस्ट्रेट जिस मस्जिद को कथित तौर पर अवैध कब्जा बता रहे हैं, उसी जमीन पर बने सरकारी कार्यालय के कब्जे की वैधता पर भी गौर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जिस सरकारी कार्यालय से मस्जिद को हटाने अथवा गिराने का फैसला लिया गया, यदि पुराने दस्तावेज़ों में उस जमीन के संबंध में सरकार का किरायेदार होना सामने आता है तो पूरे मामले की कानूनी स्थिति पर दोबारा गौर करने की जरूरत है।

मस्जिद की पुरानी मौजूदगी के संबंध में आबिद ने अदालत में पेश किए गए दस्तावेज़ों का भी हवाला दिया। उनके मुताबिक सुनवाई के दौरान वर्ष 1911 का बिजली बिल पेश किया गया, जिससे मस्जिद के पुराने वजूद का पता चलता है। इसके जवाब में वर्ष 1888 के सरकार कैसर-ए-हिन्द गवर्नमेंट ऑफ क्राउन स्टेट (अंग्रेज़ों) के कब्जे का हवाला दिए जाने की बात सामने आई। आबिद का कहना है कि 1888 में जिस सरकार कैसर-ए-हिन्द गवर्नमेंट ऑफ क्राउन स्टेट (अंग्रेज़ों) के जिस कब्जे की बात की जा रही है, वह दरअसल किरायेदारी के रूप में था और इसे महज़ कब्जे के तौर पर देखना सही होगा।क्योंकि 1822 ई. मे भी मालिक वाहिद खान/याकूब ख़ान थे, 1911 में भी और 2026 के सरकारी दस्तावेज़ों में भी वाहिद खान/याकूब ख़ान का नाम दर्ज है ।

वहीं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शाहिद अली ने मस्जिद मामले के कानूनी पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहा कि यदि भारत सरकार ने मस्जिद की संपत्ति को वैध मानते हुए वहां से अपने डाकघर के लिए दुकान अथवा जमीन किराये पर ली और लगातार किराया अदा किया, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि राज्य सरकार किस बुनियाद पर उसी संपत्ति को अवैध घोषित कर सकती है।

उन्होंने वर्ष 1956 में मस्जिद द्वारा हाउस टैक्स अथवा प्रॉपर्टी टैक्स अदा किए जाने का भी हवाला दिया। शाहिद अली का कहना है कि एक तरफ सरकार द्वारा लिए गए किराये और पुराने टैक्स रिकॉर्ड को मालिकाना हक़ के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता, वहीं दूसरी तरफ वर्ष 1911 के बिजली बिल और करीब 115 साल पुराने कब्जे को भी मालिकाना हक़ का आधार नहीं माना जा रहा है। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि निजी पक्ष के पुराने दस्तावेज़ों और कब्जे को मालिकाना हक़ के लिए स्वीकार नहीं किया जा रहा, तो सरकार के करीब 125 वर्ष पुराने कब्जे को किस आधार पर मालिकाना हक़ माना जाए।
3) 1956 में मस्जिद का वक़्फ़ रजिस्ट्रेशन है और गजट नोटिफिकेशन भी है ।इस मामले को वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में सुना जाना चाहिए था उसके बाद ही अन्य पहलुओं पर पहुँचा जा सकता था

मस्जिद पक्ष से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्ष 1877 की पुस्तक, 1868 की सरकारी चिट्ठी, 1822 के किरायेदारी संबंधी दस्तावेज़, वर्ष 1911 का बिजली बिल, 1956 का टैक्स रिकॉर्ड और 1960 में डाकघर के लिए जमीन किराये पर लिए जाने से संबंधित दस्तावेज़ पूरे विवाद के ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं को समझने में अहम हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन दस्तावेज़ों की निष्पक्ष जांच और अदालत में इनके कानूनी प्रभाव का निर्धारण होना चाहिए, ताकि जमीन के मालिकाना हक़ और सरकार के अवैध कब्जे को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ हो सके।

इस मामले पर एक शेर अर्ज़ है-

“कितना है बद-नसीब “वाहिद” नस्ल के लिए,
एक मस्जिद भी न क़ायम रह सकी कू-ए-यार में।”


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