निजी परिसर में नमाज़ और पूजा पर कोई पाबंदी नहीं, हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फ़ैसला ।
प्रशासन की अनुमति की शर्त ख़त्म, धार्मिक आज़ादी पर अदालत की बड़ी मुहर ।
रिपोर्ट- मौ. गुलबहार गौरी
इलाहाबाद – 3 फ़रवरी 26 – इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला इन दिनों उत्तर प्रदेश की सियासत और समाजी बहस के केंद्र में है। निजी परिसरों में नमाज़ और अन्य धार्मिक प्रार्थनाओं को लेकर हुई गिरफ्तारियों के मामले में हाईकोर्ट ने जो रुख अपनाया है, उसे मुस्लिम और ईसाई संगठनों ने “उम्मीद की किरण” करार दिया है। यह फैसला न सिर्फ धार्मिक आज़ादी की संवैधानिक गारंटी को दोहराता है, बल्कि पुलिस और प्रशासन की मनमानी पर भी सख़्त संदेश देता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि उत्तर प्रदेश में निजी परिसरों—चाहे वह घर हों, हॉल हों या किसी संस्था के परिसर—में धार्मिक प्रार्थना करना पूरी तरह कानून सम्मत है। इसके लिए किसी भी तरह की पूर्व अनुमति लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसे मानने और उसके अनुसार पूजा करने की स्वतंत्रता देता है।
यह अहम फैसला जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ और इमैनुअल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। अदालत ने कहा कि जब कोई धार्मिक गतिविधि निजी परिसर में, शांतिपूर्ण ढंग से और बिना किसी सार्वजनिक अव्यवस्था के की जा रही हो, तो उसे कानून-व्यवस्था का मुद्दा बनाना सरासर गलत है।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के मुस्लिम और ईसाई संगठनों ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है। उनका कहना है कि हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में ऐसे कई मामले सामने आए, जहां निजी परिसरों में पूजा या नमाज़ अदा करने पर एफआईआर दर्ज की गईं, लोगों को गिरफ्तार किया गया और बेवजह पुलिस कार्रवाई हुई। इससे अल्पसंख्यक समुदायों में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा हुआ।
प्रसिद्ध ईसाई और मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा अखिल भारतीय ईसाई परिषद के नेता जॉन दयाल ने इस फैसले को सरकार के लिए “झटका” बताया। उन्होंने कहा, “आप अपने घर के अंदर क्या करते हैं, क्या खाते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं—यह पूरी तरह आपका निजी मामला है। इसके लिए किसी से अनुमति क्यों ली जाए? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बुनियादी स्वतंत्रता को बहाल करने के लिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह इस बात का सबूत है कि हम एक देश के तौर पर कहां खड़े हैं।”
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष महमूद मदनी ने भी इस फैसले को संविधान की आत्मा की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला अनुच्छेद 25 के तहत दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की स्पष्ट और निर्णायक पुष्टि करता है। मदनी के मुताबिक, “पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में धार्मिक सभाओं को लेकर जिस तरह की पुलिस कार्रवाई देखने को मिली, उसने कानून का पालन करने वाले नागरिकों में बेवजह का डर पैदा किया। शांतिपूर्ण पूजा को कानून-व्यवस्था की समस्या बना दिया गया।”
उन्होंने जनवरी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का ज़िक्र करते हुए बताया कि वहां निजी परिसर में नमाज़ अदा करने के आरोप में 11 मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार किया गया था। मदनी ने कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासन को कड़ा संदेश देता है कि मौलिक अधिकारों को मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता। “संविधान नागरिकों को पूजा का अधिकार देता है और राज्य न तो इसे निलंबित कर सकता है और न ही छीन सकता है,” उन्होंने ज़ोर देकर कहा।
रमज़ान के पवित्र महीने के नज़दीक आने के मद्देनज़र महमूद मदनी ने प्रशासन से अपील की कि वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की भावना का सम्मान करे। उनका कहना था कि लोगों को बिना किसी डर, दबाव या दखलंदाज़ी के अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने दिया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला न सिर्फ एक कानूनी आदेश है, बल्कि यह उस संवैधानिक मूल्यों की याद भी दिलाता है, जिन पर भारत का लोकतंत्र टिका है। निजी आज़ादी, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की सीमाओं को रेखांकित करता यह फैसला आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाइयों और सामाजिक विमर्श पर गहरा असर डाल सकता है। अल्पसंख्यक समुदायों के लिए यह सचमुच “उम्मीद की किरण” बनकर सामने आया है।