विधायक उमेश कुमार के इस्तीफ़े पर सवाल, आख़िर सरकार से नाराज़गी या विपक्ष से शिकायत?
रिपोर्ट-मौ.गुलबहार गौरी
देहरादून। 30 अक्टूबर 2026-विधायक उमेश कुमार के इस्तीफ़े की वजह पहली नज़र में समझ से बाहर नज़र आती है। सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं की पोस्टों से जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक सरकार से अपनी माँगें मनवाने में विपक्ष ने उनका साथ नहीं दिया, इसी नाराज़गी के चलते उन्होंने इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया।
लेकिन इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब आज पूरे हिन्दुस्तान में विपक्ष की आवाज़ को हुकूमत के सामने तवज्जो नहीं मिल रही, तो उत्तराखंड में उसकी आवाज़ कितनी सुनी जाएगी? अगर विपक्ष का साथ न मिलना इस्तीफ़े की वजह है, तो क्या देशभर के तमाम विपक्षी विधायकों और नेताओं को भी इस्तीफ़ा दे देना चाहिए?
हक़ीक़त यह है कि विपक्ष अपनी जगह सरकार की नीतियों और फ़ैसलों का लगातार विरोध कर रहा है। सरकार को घेर रहा है और उसकी मुख़ालफ़त में अपनी आवाज़ बुलंद कर रहा है। लेकिन उत्तराखंड के इस मामले में सियासी तस्वीर कुछ अलग ही दिखाई दे रही है।
यहाँ सवाल सरकार या उसके मुखिया से नहीं, बल्कि विपक्ष से किए जा रहे हैं। सरकार के ख़िलाफ़ एक लफ़्ज़ भी कहने से परहेज़ और विपक्ष को खरी-खोटी सुनाने में पूरी ताक़त लगाई जा रही है।
आख़िर सवाल यह है कि अगर माँगें सरकार से हैं, तो जवाबदेही भी सरकार की ही बनती है। विपक्ष का काम आवाज़ उठाना है, लेकिन माँगों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी हुकूमत की होती है। ऐसे में इस्तीफ़े के पीछे विपक्ष को कसूरवार ठहराना कितना मुनासिब है? यह सवाल अब सियासी गलियारों में चर्चा का मौज़ू बनना चाहिए।
