ईसा मसीह की पैदाइश: 25 दिसंबर—तारीख़ की हक़ीक़त या रिवायत की बुनियाद
ईसा मसीह की पैदाइश: 25 दिसंबर की मान्यता पर इस्लाम और इतिहासकारों की राय
मौ. गुलबहार गौरी की कलम से 🖌️
देहरादून-25 दिसम्बर 2025 — दुनिया भर में ईसाई समुदाय हर साल 25 दिसंबर को ईसा मसीह की पैदाइश की ख़ुशी में क्रिसमस का त्योहार बड़े जोश-ओ-ख़रोश से मनाता है। गिरजाघरों में ख़ास दुआएँ होती हैं, मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं, घरों और बाज़ारों को रौशनियों से सजाया जाता है और इस दिन को प्यार, शांति, माफ़ी और भाईचारे के पैग़ाम के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन इस धार्मिक उत्सव के साथ-साथ एक बुनियादी सवाल भी बार-बार उठता रहा है—क्या वाक़ई ईसा मसीह की पैदाइश 25 दिसंबर को ही हुई थी? इस सवाल पर इस्लाम और इतिहासकारों की राय ईसाई मान्यता से काफ़ी हद तक मुख़्तलिफ़ नज़र आती है।
ईसाई मान्यता क्या कहती है
ईसाई धर्म में यह आम और प्रचलित धारणा है कि ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को हुआ। हालाँकि बाइबल में कहीं भी ईसा मसीह की पैदाइश की सटीक तारीख़ या साल का साफ़-साफ़ ज़िक्र नहीं मिलता, इसके बावजूद सदियों से ईसाई समुदाय इसी दिन को उनका जन्मदिन मानता चला आ रहा है। ईसाई धर्मशास्त्रियों के मुताबिक़ 25 दिसंबर को ईसा मसीह के दुनिया में आने, इंसानों को गुनाहों से निजात दिलाने और उन्हें सत्य व प्रेम का रास्ता दिखाने की याद के तौर पर अपनाया गया। ईसा को “ईश्वर का पुत्र” मानने वाली ईसाई मान्यता के तहत यह दिन बेहद मुक़द्दस समझा जाता है और इसे एक बड़े धार्मिक पर्व के रूप में मनाया जाता है।
इतिहासकारों की नज़र में 25 दिसंबर
इतिहासकार इस मसले को आस्था से ज़्यादा शोध और प्रमाण की कसौटी पर परखते हैं। उनके मुताबिक़ 25 दिसंबर की तारीख़ के हक़ में कोई ठोस ऐतिहासिक सबूत मौजूद नहीं है। कई इतिहासकारों का मानना है कि ईसा मसीह का जन्म ईसा से चार से छह साल पहले हुआ होगा, क्योंकि रोमन साम्राज्य और उस दौर के शासक राजा हेरोदेस से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएँ इसी ओर इशारा करती हैं।
इसके अलावा बाइबल के मुताबिक़ पैदाइश के वक़्त चरवाहे खुले मैदानों में अपनी भेड़ें चरा रहे थे। इतिहासकार कहते हैं कि फ़िलिस्तीन के इलाक़े में दिसंबर के महीने में सर्दी और बारिश होती है, ऐसे में खुले मैदानों में रात के वक़्त चरवाही आम बात नहीं थी। इसी वजह से कई विद्वानों का ख़याल है कि ईसा मसीह की पैदाइश सर्दियों में नहीं, बल्कि बसंत या पतझड़ के मौसम में हुई होगी।
इतिहास यह भी बताता है कि चौथी सदी ईस्वी में रोमन साम्राज्य में 25 दिसंबर को “सन गॉड” यानी सूर्य देवता के जन्म का त्योहार मनाया जाता था, जिसे सोल इन्विक्टस कहा जाता था। जब बाद में ईसाई धर्म को राजकीय संरक्षण मिला, तो नए धर्म के प्रचार और स्थानीय आबादी को आकर्षित करने के लिए इसी तारीख़ को ईसा मसीह की पैदाइश से जोड़ दिया गया। इसी वजह से इतिहासकार 25 दिसंबर को एक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा मानते हैं, न कि ईसा मसीह की पैदाइश की ऐतिहासिक सच्चाई।
इस्लाम का नज़रिया
इस्लाम में ईसा मसीह को ईसा बिन मरियम (अलैहिस्सलाम) कहा जाता है और उन्हें अल्लाह का जलील-उल-क़द्र और सम्मानित पैग़म्बर माना जाता है। क़ुरआन मजीद में ईसा (अ.स.) की पैदाइश का वाक़िया बड़े अदब और तफ़सील के साथ बयान किया गया है। इस्लामी अक़ीदे के मुताबिक़ ईसा (अ.स.) की पैदाइश अल्लाह की क़ुदरत का एक अज़ीम मौजज़ा थी, जो बिना वालिद (बाप) के हुई।
क़ुरआन में ईसा (अ.स.) के कई मौजज़ात का ज़िक्र मिलता है—उन्होंने अल्लाह के हुक्म से कोढ़ियों को शिफ़ा दी, अंधों की आँखें रौशन कीं, मुर्दों को ज़िंदा किया और पैदाइश के बाद पालने में बोलकर अपनी माँ हज़रत मरियम (अ.स.) पर लगे इल्ज़ामों को रद्द किया। यह तमाम बातें इस बात की दलील हैं कि ईसा (अ.स.) अल्लाह के भेजे हुए रसूल थे और उनकी ज़िंदगी मौजज़ों से भरपूर थी।
तारीख़ के सवाल पर इस्लामी राय
क़ुरआन शरीफ़ में ईसा (अ.स.) की पैदाइश की तारीख़ या दिन के बारे में कहीं भी कोई बयान नहीं मिलता। सूरह मरियम (19:16–36) और सूरह आले-इमरान (3:45–59) में पैदाइश का पूरा वाक़िया, हज़रत मरियम (अ.स.) की पाकीज़गी और ईसा (अ.स.) के मौजज़ात का ज़िक्र मौजूद है, लेकिन तारीख़ का कोई उल्लेख नहीं।
क़ुरआन में हज़रत मरियम (अ.स.) और खजूर के पेड़ का ज़िक्र भी आता है, जहाँ पैदाइश के वक़्त ताज़ा खजूर गिरने का बयान है। इसी से कई मुस्लिम विद्वान यह नतीजा निकालते हैं कि ईसा (अ.स.) की पैदाइश सर्दियों में नहीं हो सकती, क्योंकि ताज़ा खजूर आमतौर पर गर्मी या पतझड़ के मौसम में मिलते हैं। इस बुनियाद पर इस्लाम 25 दिसंबर को ईसा (अ.स.) की पैदाइश मानने की तस्दीक़ नहीं करता।
25 दिसंबर और इस्लामी रवैया
इस्लाम में न तो 25 दिसंबर को ईसा (अ.स.) की पैदाइश का दिन माना जाता है और न ही इसे किसी धार्मिक त्योहार के तौर पर स्वीकार किया जाता है। मुसलमान ईसा (अ.स.) पर ईमान रखते हैं, उनका गहरा एहतराम करते हैं और उन्हें अल्लाह का रसूल मानते हैं, मगर उनके जन्मदिन को मनाने की कोई दीनि हिदायत मौजूद नहीं है।
नतीजा
ईसा मसीह की पैदाइश को लेकर 25 दिसंबर की मान्यता ईसाई धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जबकि इतिहासकार इसे ऐतिहासिक रूप से साबित नहीं मानते। इस्लाम भी ईसा (अ.स.) की पैदाइश को एक अज़ीम इलाही चमत्कार मानता है, मगर किसी तय तारीख़ को अक़ीदे का हिस्सा नहीं बनाता। यूँ कहा जाए तो 25 दिसंबर आज एक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है, जबकि ईसा (अलैहिस्सलाम) की असली पहचान, उनका पैग़ाम और उनकी तालीम—तौहीद, इंसाफ़, रहम और इंसानियत—वह बुनियादी उसूल हैं, जो तारीख़ से कहीं ज़्यादा अहम और हमेशा बाक़ी रहने वाले हैं।