क्या भारत में बुजुर्ग होना जुर्म है,IFWJ अध्यक्ष अवधेश भार्गव व उपाध्यक्ष मौ. गुलबहार गौरी का सरकार पर करारा प्रहार
रिपोर्ट-मौ. गुलबहार गौरी
नई दिल्ली-( 28 दिसंबर 25 ) इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौ. गुलबहार गौरी का बुजुर्गों को लेकर तीखा बयान, सरकार से ठोस और संवेदनशील नीति की मांग
नई दिल्ली।
इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौ. गुलबहार गौरी ने देश में बुजुर्गों की लगातार बिगड़ती हालत पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए सरकार की नीतियों पर सख़्त सवाल खड़े किए हैं। दोनों वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि जिन बुजुर्गों ने अपनी पूरी ज़िंदगी देश और समाज की तामीर में गुज़ार दी, आज वही लोग हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। यह हालात न सिर्फ अफ़सोसनाक हैं, बल्कि सरकार की संवेदनहीनता को भी उजागर करते हैं।
राष्ट्रीय अध्यक्ष अवधेश भार्गव ने तल्ख़ लहजे में कहा कि “अगर सरकार 65 साल से ज़्यादा उम्र के नागरिकों की सुध लेने को तैयार नहीं है, तो फिर यह मान लेना चाहिए कि भारत में बुजुर्ग होना ही अपराध बना दिया गया है।” उनका कहना था कि यह बयान किसी सनसनी या विवाद के लिए नहीं, बल्कि उन करोड़ों बुजुर्गों की दर्दनाक हकीकत को सामने लाने की कोशिश है, जिनकी आवाज़ अक्सर सत्ता के गलियारों तक पहुंच ही नहीं पाती।
अवधेश भार्गव ने सवाल उठाया कि “क्या 70 साल के बाद इंसान की ज़रूरतें खत्म हो जाती हैं?” मेडिकल इंश्योरेंस कंपनियां 70 वर्ष की उम्र पार करते ही बुजुर्गों को बीमा देने से इनकार कर देती हैं। बैंक EMI पर लोन नहीं देते, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में तरह-तरह की अड़चनें खड़ी कर दी जाती हैं और निजी व सरकारी संस्थानों में काम के तमाम रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। नतीजतन बुजुर्ग आर्थिक रूप से कमजोर होकर दूसरों पर निर्भर होने को मजबूर हो जाते हैं।
IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौ. गुलबहार गौरी ने कहा कि बुजुर्गों के साथ यह रवैया एक तरह से सामाजिक अन्याय है। उन्होंने कहा, “रिटायरमेंट की उम्र तक यानी 60–65 साल तक एक आम नागरिक पूरी ईमानदारी से टैक्स देता है, बीमा प्रीमियम भरता है और देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करता है। मगर रिटायर होते ही वही इंसान सरकार और सिस्टम के लिए बोझ मान लिया जाता है।” उन्होंने अफ़सोस जताया कि बुजुर्गों को मिलने वाली मामूली पेंशन भी इनकम टैक्स के दायरे में ला दी जाती है, जो उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देती है।
दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सरकार की नीतियों में दोहरे मापदंड पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि राजनीति में बुजुर्ग नेताओं को विधायक, सांसद या मंत्री बनने पर तमाम सुविधाएं मिलती हैं—भारी वेतन, आजीवन पेंशन, सरकारी गाड़ियां, बंगले और सुरक्षा। मगर आम नागरिक, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी मेहनत और ईमानदारी से गुज़ारी, उसके लिए ऐसी कोई ठोस व्यवस्था क्यों नहीं?
अवधेश भार्गव ने चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा कि बुजुर्गों को कमज़ोर समझना सरकार की बहुत बड़ी भूल हो सकती है। उनके पास अनुभव है, समझ है और लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त—मतदान का अधिकार है। अगर देश के बुजुर्ग एकजुट होकर चुनाव में सरकार के खिलाफ खड़े हो गए, तो उसके असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। “बुजुर्गों को सरकार बदलने का ज़िंदगी भर का तजुर्बा है, उन्हें नज़रअंदाज़ करना सरकार को भारी पड़ सकता है,” उन्होंने कहा।
रेल और हवाई यात्रा में बुजुर्गों को मिलने वाली छूट खत्म किए जाने पर भी IFWJ के पदाधिकारियों ने गहरी नाराज़गी जताई। पहले ट्रेन और विमान यात्रा में 40 से 50 प्रतिशत तक की छूट बुजुर्गों के लिए बड़ी राहत हुआ करती थी, जिससे वे इलाज या पारिवारिक ज़रूरतों के लिए सफर कर पाते थे। अब यह सुविधा बंद हो जाने से बुजुर्गों की परेशानियां कई गुना बढ़ गई हैं।
IFWJ की ओर से सरकार के सामने बुजुर्गों के हित में पाँच अहम मांगें रखी गईं—
1. 60 वर्ष से अधिक उम्र के सभी नागरिकों को पेंशन दी जाए, ताकि वे सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन बिता सकें।
2. पेंशन की राशि व्यक्ति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के अनुसार तय की जाए, न कि सबके लिए एक जैसी और नाकाफी।
3. ट्रेन, बस और हवाई यात्रा में बुजुर्गों को विशेष छूट दी जाए, जिससे इलाज और ज़रूरी सफर आसान हो सके।
4. आख़िरी सांस तक सभी बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य किया जाए, और उसका प्रीमियम सरकार वहन करे।
5. बुजुर्ग नागरिकों से जुड़े कोर्ट मामलों को प्राथमिकता पर निपटाया जाए, ताकि वे सालों तक न्याय के इंतज़ार में न रहें।
6. अकेले रह रहे बुजुर्गों के लिए स्थानीय पुलिस की निगरानी ज़रूरी, विदेश में रहने वाले बच्चों के माता-पिता को प्राथमिक सुरक्षा श्रेणी में शामिल किया जाए।
अंत में IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने साफ़ कहा कि बुजुर्ग किसी समाज पर बोझ नहीं होते, बल्कि वही उसकी बुनियाद होते हैं। अगर बुनियाद को ही कमज़ोर कर दिया जाए, तो इमारत कैसे कायम रहेगी? सरकार को चाहिए कि वह कल्याणकारी योजनाओं में बुजुर्गों को भी उतनी ही अहमियत दे, जितनी अन्य वर्गों को दी जाती है। बुजुर्गों का सम्मान ही किसी सभ्य, संवेदनशील और इंसानियत से भरे समाज की असली पहचान है।