आज भी गूंजता है ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’, मौलाना हसरत मोहानी की 150वीं जयंती
इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारे से आज़ादी की लौ जलाने वाले मौलाना हसरत मोहानी की 150वीं जयंती
लखनऊ | विशेष रिपोर्ट-सुल्तान शहरयार ख़ान
1 जनवरी 26 -हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग में जिन शख़्सियतों ने कौम को सोच, हौसले और बग़ावत की नई राह दिखाई, उनमें मौलाना हसरत मोहानी का नाम आज भी पूरी शान और एहतराम के साथ लिया जाता है। 1 जनवरी 1875 को जन्मे मौलाना हसरत मोहानी की 150वीं जयंती देशभर में अदबी, सियासी और सामाजिक संगठनों द्वारा अकीदत और एहतराम के साथ मनाई जा रही है। ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ जैसा बुलंद और जुझारू नारा देने वाले इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ न सिर्फ़ कलम से जंग लड़ी, बल्कि जेलों की सख़्त यातनाएँ भी हँसते-हँसते बर्दाश्त कीं।
मौलाना हसरत मोहानी का असली नाम सैयद फ़ज़लुल हसन था। उनका ताल्लुक उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के मोहान क़स्बे से था। मोहान की मिट्टी से उठकर उन्होंने आज़ादी की तहरीक में ऐसी इंक़लाबी चिंगारी सुलगाई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वे सिर्फ़ एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि नामचीन शायर, लेखक और बेबाक पत्रकार भी थे। उनकी शायरी और लेखनी में इंक़लाब की आग, इंसाफ़ की पुकार और इंसानी बराबरी का पैग़ाम साफ़ तौर पर झलकता है।
‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा जब पहली बार गूंजा, तो वह महज़ अल्फ़ाज़ नहीं था, बल्कि गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने का ऐलान था। बाद के वर्षों में यही नारा भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की ज़ुबान बना और आज़ादी की लड़ाई की पहचान बन गया। मौलाना हसरत मोहानी पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मंच से “पूर्ण स्वराज” की मांग बुलंद आवाज़ में रखी। उस दौर में यह मांग अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए सीधी और खुली चुनौती मानी जाती थी।
अंग्रेज़ सरकार की मुख़ालिफ़त में मौलाना हसरत मोहानी को कई बार जेल जाना पड़ा। क़ैद, अभाव और शारीरिक यातनाओं के बावजूद उन्होंने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। उनकी सादगी मिसाल बन गई थी। सांसद बनने के बावजूद वे बेहद साधारण जीवन जीते रहे और संसद तक पैदल या थर्ड क्लास में सफ़र करना उनकी पहचान बन गया। सत्ता और सुविधा से दूर रहकर उन्होंने राजनीति को सेवा और संघर्ष का माध्यम बनाए रखा।
13 मई 1951 को मौलाना हसरत मोहानी का इंतक़ाल हो गया, लेकिन उनका विचार, उनका नारा और उनका संघर्ष आज भी ज़िंदा है। 150वीं जयंती के मौके पर बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों ने कहा कि मौलाना हसरत मोहानी का जीवन आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि इंक़लाब सिर्फ़ हथियार से नहीं, बल्कि विचार, कलम और हिम्मत से भी आता है।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि मौलाना हसरत मोहानी किसी एक मज़हब या वर्ग के नेता नहीं थे, बल्कि वे पूरे हिंदुस्तान की साझी विरासत हैं। उनकी 150वीं जयंती हमें याद दिलाती है कि आज़ादी यूँ ही नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे अनगिनत कुर्बानियाँ, जेलें और इंक़लाबी आवाज़ें थीं। ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा आज भी उसी जोश के साथ गूंजता है और मौलाना हसरत मोहानी की यादों को हमेशा ज़िंदा रखे हुए है।