जो तिरंगे से कतराते रहे, वही आज इतिहास बदलना चाहते हैं — मुरली मनोहर


जो तिरंगे से कतराते रहे, वही आज इतिहास बदलना चाहते हैं — मुरली मनोहर ,

मनरेगा का नाम बदलना आज़ादी के आंदोलन का अपमान है ,महात्मा गांधी के नाम से परहेज़ क्यों ? केंद्र सरकार पर बरसे मुरली मनोहर,

 

मौ. गुलबहार गौरी

हरिद्वार।18 दिसम्बर 25
उत्तराखंड कांग्रेस स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी प्रकोष्ठ की एक अहम सभा में केंद्र सरकार के मनरेगा का नाम बदलने के निर्णय को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। सभा को संबोधित करते हुए प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष श्री मुरली मनोहर ने कहा कि महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी विश्व की सबसे लोकप्रिय ग्रामीण रोजगार योजना का नाम बदलना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक द्वेष और ऐतिहासिक कुंठा का स्पष्ट परिचायक है। उन्होंने कहा कि यह फैसला आज़ादी के महान आंदोलन और उसके नायकों का अपमान है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मुरली मनोहर ने उर्दू लहजे में अपनी बात रखते हुए कहा कि मनरेगा महज़ एक योजना नहीं, बल्कि गांव, गरीब और मेहनतकश की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ वह भरोसा है, जिसने करोड़ों परिवारों को रोज़गार की गारंटी दी और गांवों के विकास को नई दिशा दी। उन्होंने कहा कि जिस महात्मा गांधी ने देश को आज़ादी की राह दिखाई, उनके नाम को योजनाओं से हटाने की कोशिश करना उस इतिहास से मुंह मोड़ने जैसा है, जिसने भारत को पहचान दी।

उन्होंने तल्ख़ अंदाज़ में आरोप लगाया कि आज जो लोग सत्ता में बैठे हैं, वही लोग आज़ादी के आंदोलन के दौरान या तो खामोश रहे या फिर अंग्रेज़ी हुकूमत के सामने माफ़ीनामे लिखते नज़र आए। उन्होंने कहा कि जिन संगठनों ने 52 वर्षों तक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का तिरस्कार किया, आज वही लोग राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो लोग आज़ादी के आंदोलन को नकारते रहे, वे आज महात्मा गांधी और स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को मिटाने पर आमादा हैं।

सभा में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मनरेगा का नाम बदलना सिर्फ़ नाम का सवाल नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतिबिंब है, जो आज़ादी के आंदोलन, उसके आदर्शों और बलिदानों से असहज महसूस करती है। वक्ताओं ने कहा कि यह फैसला ग्रामीण भारत के साथ-साथ देश की ऐतिहासिक चेतना पर भी हमला है।

सभा में सर्वसम्मति से एक निंदा प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें केंद्र सरकार के इस निर्णय की कड़ी भर्त्सना की गई। साथ ही यह भी तय किया गया कि इस मुद्दे पर महामहिम राष्ट्रपति महोदया को एक ज्ञापन प्रेषित किया जाएगा, ताकि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति तक इस विरोध की आवाज़ पहुंचे।

इस अवसर पर सभा में मौजूद वरिष्ठ पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखे। श्री सुरेंद्र कुमार सैनी ने कहा कि महात्मा गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं, जिन्हें मिटाया नहीं जा सकता। अवधेश पन्त ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात बताया। श्री गोपाल नारसन और सुरेंद्र सिंह बुटोला ने कहा कि आज़ादी के आंदोलन और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

नवीन शरण निश्चल, सत्य प्रकाश चौहान, सुधीर कौशिक, मुकेश त्यागी और राजन कौशिक सहित अन्य वक्ताओं ने भी केंद्र सरकार के फैसले को इतिहास से छेड़छाड़ की कोशिश करार दिया और कहा कि कांग्रेस पार्टी और स्वतंत्रता सेनानियों के उत्तराधिकारी इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेंगे।

सभा का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि आज़ादी के आंदोलन की विरासत, महात्मा गांधी के विचार और देश के स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान हर हाल में बचाया जाएगा, और किसी भी सियासी कुंठा को इतिहास पर हावी नहीं होने दिया जाएगा।


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